जिला : रायपुर छत्तीसगढ़
विधा : मुक्त छंद
शीर्षक :
_*अनंत यात्राएँ*_
मैंने की हैं अनंत यात्राएँ
तुम्हारे पथ पर,
यात्रा 'मैं' से 'तुम' और 'तुम' से 'हम' की|
वे सब तो कहते आए हैं कि सरल नहीं ये मार्ग ,
जो 'मैं' को 'तुम' से मिलवाता है ,
कहते हैं ,वहीं का हो जाता है ,
जो उस गंतव्य को पा जाता है।
सारा कुछ यहीं धरा रह जाता है ।
इस ओर का सारा मोह छूट जाता है |
परन्तु.......
मैंने तो की हैं दोतरफा यात्राएँ सदा ही |
जा जा कर लौट आती हूँ हमेशा ;
क्योंकि
मेरा पथ दुर्गम नहीं ,
कष्टों , बाधाओं से भरा नहीं है ।
वह तो बड़ा ही सीधा और छोटा है |
उस पथ पर
न गहरी खाईयाँ हैं ,
न कठिन चढ़ाईयाँ हैं |
न भू स्खलित होता है ,
न कभी पूरा ही आता है |
ये तो केवल
दो पग की यात्रा है।
नैनों के दो खुले कपाट बंद किए ...
और सारे धाम , सारे तीरथ साक्षात् |
अकिंचन से किंचित , किंचित से अखिल होने की ये अनंतिम यात्रा
चली आ रही है और चलती ही रहेगी
उस अंतिम यात्रा तक |
तब तक....
मैं यूँ ही दौड़कर लाती रहूँगी आशीष तुम्हारा ,
ज्यों पड़ोस की दुकान से बच्चे दौड़-दौड़ कर
सौदा लाते हैं ।
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व्याख्या : इस कविता में ईश्वर से मिलने का सबसे सरल मार्ग सुझाया गया है ।
मैं से तुम और तुम से हम बहुत उम्दा रचना देवयानी शर्मा जी
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