रचनाकार _ सावित्री यादव "सावि "
बिलासपुर छ. ग.
विधा _ छंद मुक्त कविता
शीर्षक _ जीवन का सफर
जिंदगी का सफर हो या जीवन के,
किसी एक दिन का सफर हो |
कुछ ना कुछ छुट्ट ही जाता है |
बस यादो में कुछ बातो में उस पल |
की खुशबु रहती है | उम्र भर |
फिर चाहकर भी वो पल दुबारा नहीं आता |
हाँ उस पल की बाते जिंदगी भर मन को है |भाता |
सफर ऐसा है | जीवन का हर पल कुछ सीखकर |
कुछ लेकर, कुछ देकर, कुछ खोकर , कुछ पाकर |
जीना सीखता है |
जीवन दुख_ सुख की ही पूरी कड़ी है |
किसी का दुख बढ़ा किसी का छोटा है |
दस्तूर है |ये जीवन का पल में पल बदल जाता है |
ये जीवन ऐसा जीयो की यहाँ रहने नहीं घूमने आये है |
जाना है |इस दुनिया से ये सदा ध्यान रहे |
सबके लिये मन में करुणा और मान रहे |
सफर सार्थक हो इसलिए सदा ईश्वर का ध्यान रहे |
एक दिन उस परमात्मा में मिल जाना ये ज्ञान रहे |
भावार्थ _जीवन के सफर की सच्चाई
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