*जिला-रायपुर,छत्तीसगढ़ ।
शीर्षक- ""जिन्दगी हाशिए में---।
विधा--कविता (छ्न्द -मुक्त)
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***जिन्दगी हाशिये में---- ।
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ऐ मेरे दोस्त--
जिन्दगी को,हाशिये मत रखिये,
कोरे पन्ने पर,
अपने कर्मों का,निशान छोड़िये,
अपने अनुभवों का,
ऐसा, रंग भरिये,
ताकि,सबका जीवन कलामय,
रचनात्मक,सृजनात्मक और
मंगलमय हो जाये ।
हम हाशिये से उठकर,
किताबों में,बदल जायें,
जहाँ है,ठौर ---
वहीं है,वतन अपना,
पर,ये मिट्टी है,भारत की,
गाँव-नगर-मौहल्ला में,
है बसती,
जहाँ है,जाति-भाषा का भेद ।
जिसे हमने---
अपने स्वार्थ के खातिर हैं बाँटे,
कभी,इसे आरक्षण का नाम दे
तो कभी,साम्प्रदायिक समुहका नाम दे
लोगों को ऊबा रहे हैं,
अब ये,बना रहे हैं,
नई-नई सँस्कृतियों का सृजन,
कहीं साँई बाबा मण्डल,
तो कहीं,संतों के संगठन,
पर,ये सब हैं,
समता मूलक जीवन-दर्शन ।
आज हमारी,अतृप्त खोजों और
मन में उठी अभिलाषाओं,
की पूर्ति,फ़िर भी,नहीं हो पाती,
पर ,विराम दिया,
इन्हीं संत-महात्माओं के उपदेशों ने,
इनकी शरण में जाने को,
हम हैं,कितने व्याकुल व प्यासे,
जब थक जाते हैं,और
हो जाता है,व्यथित हमारा मन,
अंजुली भर पुष्प,इन्हें अर्पित कर,
मन ही मन,
बहुत ही सुकून-सा ,
महसूस हैं,कर पाते ।
आज "मशीनी युग "की दुनिया में,
मानव-शरीर---
एक कारख़ाना बन गया है,
जिसे,सिर्फ़,गतिमय ही रहना है,
क्योंकि---
मशीनें कभी भी,
व्यवहारिक नहीं होती हैं,
जो कि सिर्फ़---
दूसरे के,हाथों की कठपुतलियां मात्र
ही बनकर रह जाती हैं,
यदि,हम भी---
वैसे ही बन जायें,
तो,इस अनमोल जिन्दगी में,
फिर,एक बार---
हम,हाशिये में,नज़र आयेंगे ।
यदि ,जिन्दगी में--
किताब बनना चाहते हो तो--?
गुरु-शिष्य की--
परंपरा का तुम पालन करते जाओ,
आस्था,श्रद्धा ,भक्ति व ज्ञान की,
तुम,सिर्फ़ आहुतियां देते जाओ,
और सरिता की तरह---
तुम,सदा बहते ही जाओ ।
======इति============
**मौलिक प्रस्तुति-अरमो,रायपुर ।
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