स्धान -दुर्ग (छ.ग.)
विधा-छंद मुक्त कविता
शीर्षक-सद्व्यवहार ।
*सद्व्यवहार*
कुछ नियम,कुछ कायदे,
अच्छी आदतें,सच्ची बाते।।
लोगों से किये भले व्यवहार,
जीवन को सफल बनाती है।।
छल-कपट और झूठी बातें,
जीवन में अंधकार लाती हैं।।
करो सदा बड़ो का सम्मान,
मन में ना हो कोई अभिमान।।
बोलो ना कड़वे बोल कभी,
बात भले हो कितनी सच्ची।।
मीठे बोल होते अनमोल,
कानों में मिश्री देते हैं घोल।।
बाँटकर दुख-दर्द और प्यार ,
मिल जाती है खुशियाँ अपार।।
कुछ ना हो गर पास तुम्हारे ,
तो दे दो बस प्रेम-व्यवहार ।।
स्नेह करें हर एक जीव से,
मन में सदा हो दया का भाव ।।
पेड़ -पौधे ,पशु-पक्षी ,जानवर
सबको हमेशा देना सम्मान ।।
ना करो कभी किसी का अपमान
गरीब,बुजुर्ग सबको देना है मान।।
जितना दोगे बढ़ती ही जायेगी,
खुशी , आदर और ज्ञान-भडार ।।
मात-पिता से बढ़कर ना कोई,
संस्कार की प्रथम सीढ़ी यही।।
श्रद्धा-भक्ति ,जीवन का जीत,
करना सदा इन चरणों में अर्पित।।
स्वस्थ शरीर होगी निरोगी काया,
नियमित दिनचर्या ,करो व्यायाम।
सद्व्यवहार जीवन की पूंजी,
कठोर श्रम सफलता की कुंजी।
मनचाही मंजिल तुम्हें गर पाना है ,
मेहनत से ना कभी घबराना हैं।।
अनुरमा शुक्ला
दुर्ग (छ.ग.)
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