जिला रायपुर छत्तीसगढ़
शीर्षक डेहरी
विधा। मुक्त छंद
डेहरी
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मौसम के धूप,छांव में वह,
खुद ही तार पर फड़फड़ाती है।
पस्त सन्नाटों कि सिहरन में ,
वह गेट को झूला झूलाती है ।
मुंडेर पर बैठी गौरय्या और वह,
ऊंघते फुरसतिया बतियाते हैं ।
छत पर ऐसे ही लुढ़क कर ,
बादलों में हाथी,घोड़ा ढूंढ़ लाती हैं
कागज पर पावडर छिड़क कर,
आधे दर्पण में खुद पूरा देखती हैं।
चेहरे पे भावों की बिवाईयां ढकने,
जानबूझ के बड़ी बिंदी लगाती हैं
आंखों में आंजकर ज्यादा काजल
स्याह पलों को भूल जाती हैं ।
संस्कारों की बेड़ियों से परे,
गुस्ताख़ एड़ियों को रगड़ते।
दहलीज की डेहरी पर पसर कर,
कोई औरत,औरत हो जाती है ।।
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