रायगढ़, छत्तीसगढ़
विधा-मुक्त छंद
विषय- संस्कार
शीर्षक- संस्कारों की दुर्दशा
संस्कृति और संस्कारों की दुनिया में
हिंदुस्तान की एक अलग पहचान है
संस्कृति और संस्कारों की दुहाई देता
आज देश का हर एक इंसान है
पर इस देश की आज दुर्दशा भारी है
संस्कारों को निभाने की जिम्मेदारी
सिर्फ स्त्रियों के हिस्से आई है
चाहे जिस रूप में हो स्त्री
बेटी ,बहन,बहु,पत्नी या फिर माँ
संस्कारों के नाम पर उसके
स्वाभिमान को कुचला जा रहा
संस्कारों की चुनर ओढ़ उसे
अपने परिवार की इज्ज़त की बचाना है
पुरुषों की हवश भरी नज़रों से
अपने दामन को छिपाना है
आज रिश्तों की पहचान खोता
हमारा पुरूष प्रधान समाज को
चाहे वह किसी भी उम्र में हो
उसमें सिर्फ स्त्री नज़र आती है
पर क्यों नही हम सिखलाते?
पुरुषों को भी संस्कार
क्यो नही हम बतलाते?
स्त्री- पुरुष हैं एक समान
संस्कृति और संस्कारों के
इस देश मे क्यो नही हम बनाते
एक सुंदर परिवेश?
Ati Sundar Bhabi..
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