संबलपुर, जिला-कांकेर, (छ .ग.)
विधा-सायली छंद
विषय-नदी
*नदी*
नदी,
निर्झर,सरिता,
जीवन देने वाली,
शीतल धारा,
बहती।
सरिता,
फूट निकलती,
गिरि -अंतस से,
गिरती धरा,
पर।
नदी,
जीवन देती,
अन्न-धन,भरती
आस लिए,
मानव।
नदी,
जीवन बनना,
अमृत बन बहना,
प्यास बुझाना,
सबकी।
नदी,
प्यास बुझाती,
धरा को हर्षाती,
सुषमा बन,
बिखरती।
*व्याख्या*-उपरोक्त कविता में नदी जीवन देने वाली ,शीतल धारा के संग बहती।पहाड़ों से निकल धरा पर बहती।नदी अन्न-धन देती है।अमृत बनकर आस बढ़ाती और सौन्दर्य बिखराती है।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर,(छ. ग.)
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