जिला :- महासमुंद
विधा :- सायली छंद
शीर्षक :- नदिया
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१
निर्झरिणी,
निरंतर बहती,
पावन लिए जलधार,
करती धरा,
उपकार।
२
सरिता,
सागर से,
मिलने को चली,
सरपट दौड़ी,
बावली।
३
तटिनी,
तट पर,
होती मृदा उपजाऊ,
अन्न उगाता,
कमाऊ।
४
है,
अकूत रहस्य,
निज में छुपाकर,
रत्नाकर से,
मिलती।
५
है,
आस लिए,
करे सागर मीठा,
मिठे जल,
उड़ेलती।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने नदियों के अविरल बहती धारा को अपने शब्दों में पिरोने का प्रयास किया है जो खुद में बहुत से रहस्य छुपाकर रखी है। साथ ही बड़े ही चंचलता से बहते हुए खारे सागर को मीठा करने की आस लगाई हुई है।
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