*निवास-बैरन-बाजार,रायपुर ।
*जिला--रायपुर,छत्तीसगढ़ ।
विधा--सायली ।
शीर्षक- नदी ।
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हे !
नदी तुम
पहाड़ों से बहकर
आती हो
धरा ।
धरा
में बहकर
करती कल्याण सबका
जीव ,वनस्पति
सारे ।
हे !
नदी तुम
जीवन सार हो
सारे जग
का ।
ना
होती तुम
धरा में तो
मर जाते
हम ।
तो
हमारी प्यास
तुम बुझाती कैसे
हर मौसम
में ।
मैं
बन यमुना
नदी ,बहती जाऊँ
मथुरा किनारे
से ।
हे !
कृष्ण तुम
सबके हो तारनहार
अब मुझको
तारो ।
फँसी
है मेरी
नैय्या बीच मंझधार
इसे लगाओ
पार ।
दे--
गीता का
उपदेश सँसार को
करते मानव
उध्दार ।
हे !
प्रभु द्वारिका
धाम में जा
विराजे हो
तुम ।
पा--
लेंगे दर्शन
तेरा हम सब
मुक्ति मिले
हमको ।
मैं--
गंगाजल बन
पवित्रता को लाऊँ
सबको मुक्ति
दिलाऊँ ।
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व्याख्या:--उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि नदी की महिमा अपार है ।प्रभु कृष्णजी और गंगा नदी दौनों का मानव में उतना ही महत्व है ।
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स्वरचित प्रस्तुति-एच-एस-अरमो,रायपुर ।
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