रचियता-मोनालिसा बेहरा
रायगढ़,छत्तीसगढ़
विषय-जीवन
विधा-छंद मुक्त
शीर्षक- ये कैसी जिंदगी
सोचती हूँ मैं अक्सर
जीवन क्या है?
भीड़ के कोलाहल में
चलते-फिरते लोग
जो अक्सर जीते तो हैं
पर उन्हें भी जिंदगी का
अर्थ नही मालूम
बहुत कुछ मिलता है जीवन में
पर लालसा नही मिटती
कुछ और पाने की चाहत
हमेशा रहती है दिल में
इस पाने और खोने की कसमकश में गुजर जाती है जिंदगी
फिर भी लोग समझ नही पाते
क्या खोया और पाया जीवन में
ये कैसी जिंदगी?
जहाँ हरपल मौत का एहसास हो
बीते हुए कल में जीने की चाह हो
और आने वाले कल का भय सा हो जैसे निरसता में
जिये जा रही हो जिंदगी
सोचती हूँ मैं अक्सर
इतनी बेजान क्यूँ होती है
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