स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
शीर्षक -"छत्तीसगढ़िया सुवाद"
विधा- छंदमुक्त कविता
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आनी बानी के रोटी पीठा
बनाते जी छत्तीसगढ़िया
खुरमी ठठरी अउ गुजिया
अबर मीठे लागे गुलगुलिया
लाड़ू बनथे रकम - रकम
मुर्रा मूंगफली और रक्सिया
गुर चीला, गुर जलेबी मा
भरे रइथे अबर रसिया
हिरवा पूरी मा भरे हिरवा
मोर महतारी हे छनईया
कोशियार के रस में डूबे
रसौरी के अबर खवैया
रुख ताल हवे तीर तरिया
जेठ आषाढ़ म पाक जईथे
त ताल के रोटी बनाये मा
कछु नहीं लागे रे भईदा
तिहार आवे या नोनी बिहावे
अईरसा रोटी ला बनाथे जोरैया
बरा-भजिया के नाव नई लेहु त
हो जाही जी मोर किरकिरिया
पपची, सोहारी,अउ दहरौली
इ जमो के महुं आंव अबर खवैया
तुहरो मुहू मा पानी आ जाही त
आ जाइहो बना के खवाहुँ जी भईदा
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