२. राज्य-- राजनांदगांव, छत्तीसगढ़ राज्य
३. रचना का शीर्षक-- " मैं कौन हूं "
कविता--
" मैं कौन हूं "
बार-बार दोहराया जाता रहा है
मुझे
इसी एक प्रश्न के बहाने
यही प्रश्न
बार-बार करता रहा है
मेरा मंथन
क्योंकि मुझे मालूम है
मैं सागर की वह लहर हूं
जो पूरे वेग से उठती है
और फिर
मिल जाती है सागर में
कुरुक्षेत्र के मैदान में
श्री कृष्ण के हाथों उठाया गया
पहिया भी मैं ही हूं
जो युद्धरत होते हुए भी
निर्लिप्त है युद्ध से
मेरा अस्तित्व
आकाश से टपकी हुई
बारिश की उस बूंद की तरह है
जो सूरज की तपन पाकर
फिर जा मिलेगा आकाश से
मैं पानी से भरे हुए
बर्तन के भीतर नजर आ रहे
आकाश का एक टुकड़ा हूं
अगर विश्वास कर सको
तो मैं पर्वत का शिखर हूं
धरती की अतल गहराई भी
मैं ही हूं
मैं संघर्ष हूं, मैं ही शांति हूं
मैं आश्वस्त हूं और भ्रांति भी मैं
ही हूं
कर्तव्य और परिणाम
मेरे ही वश में हैं
मैं वह सब कुछ हूं
जो मैं हो सकती हूं
और वह भी हूं
जो मैं नहीं हो सकती
जब भी कुछ हार रहा होता है
मेरे भीतर
सच मानो
मैं जीत रही होती हूं
आश्चर्य होगा तुम्हें
मेरे बारे में जानकर
लेकिन विश्वास करो
यह सब
एक इंसान के लिए ही संभव है
क्योंकि
उसका सबसे बड़ा शस्त्र
कर्म मात्र नहीं
कर्म के चुनाव की स्वतंत्रता है
जिसके दम पर
इंसान वह सब कुछ हो सकता है
जो उसे होना चाहिए
दरअसल
मैं वह नहीं हूं
जो कुछ दिख रहा है मुझ में
मैं वह हूं
जिसे देख पाना आसान नहीं
खोलनी पड़ती है
मन की आंखें
खटखटाना पड़ता है
भीतर के द्वार
जहां सदियों से बंद है
इस प्रश्न का उत्तर
कि मैं कौन हूं ?
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डॉ. शोभा श्रीवास्तव
राजनांदगांव
छत्तीसगढ़ राज्य
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