जिला-कांकेर,छग
शीर्षक- स्कूल के वो दिन
विधा-संस्मरण
संचयिका दिवस पर सबको भाषण तैयार कर लाना था।
मैं भी घर आकर लिखने के लिए कहीं। बाबूजी ने भाषण लिखा। मैं कई बार बोल कर सुनाई।कन्या शाला के छठवीं से 12वीं तक के विद्यार्थियों का समूह कागज हाथ में लेकर बिना देखे बोलते अटक गई।सबका चेहरा देखी सब मेरे भूल जाने पर ठहाके लगाते। कोई मुंह बनाता। संचालन कर रहे श्रीवास्तव सर फूर्ती से मंच पर आये।जोर से चिल्लाए। छोटी- सी
मंच पर बोलने का प्रयास कर रही थी, भूल गई तो हंसते हो। देखना एक दिन यही बच्ची इतना अच्छा बोलेगी कि देखते रह जाओगे।सर मेरी ओर मुखातित हुए मैं सिसक कर रो रही थी। उन्होंने मुझे कहा आंसू पोंछो और देख कर पढ़ो। मैं देख कर पढ़ी। सांत्वना पुरस्कार के रुप में छोटी -सी कटोरी मिला था। मैं पूजा के गुलाल को उस कटोरी में रख दी।उस दिन के बाद हर भाषण में मैं प्रथम आई। पिछले साल वही सर मेरे घर राज्य पाल पुरस्कार मिलने पर मेरे घर आते। पेपर में पढ़ा था, यहां बाइक अंदर करते एक दिन देखा था।बधाई देने चला आया। मुझे समझ नहीं आया ,सर का सम्मान कैसे करुं। मैं अंदर गई और वहीं साल जो मुझे राज्यपाल महोदया माननीया अनुसुइया उयके ने ओढ़ाया था। मैंने सर को ओढ़ा दिया। मैंने सर से इतना ही कहा उस दिन आप सांत्वना न देते तो यह पुरस्कार मुझे नहीं मिलता। मैंने कहां कुछ किया,जो तुम्हारे अंदर था उसे ही तो बाहर निकालने का प्रयास किया। मैं भी आज शिक्षिका हूं ।बच्चों के प्रतिभा को निखारने और लोगों के बीच लाने का प्रयास करती हूं।आज भी स्कूल के वो दिन बुलाते नहीं भूलती।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर, छग
***************************
This comment has been removed by the author.
ReplyDeleteNice mam
ReplyDelete