शीर्षक झूला
रचनाकार श्रीमती रजनी शर्मा
जिला। रायपुर छत्तीसगढ़
विधा मुक्त छंद
झूला
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गोंचा तिहार के आते ही,
झूला झूलानी शुरू हो जाता है।
बायले ,पिला के चेहरों पर,
चंपई उजास पसर सा जाता है।
भूल जाते हैं सब,
चालीस कोस की थकान ।
फन्नस कुआ के लिये,
पिला का गागना।
बोबो रांधती बायले,
नोन डगराती बायले,
छूना चाहती है आसमान।
वो भी झूले के खांचो में
बैठ कर।
हां गवाही जो देती है,
आवाज.............।
किरकोंय_किरिच ,
किरकोंय किरिच ......।
रजनी
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