स्थान-----नवापाराखुर्द/सक्ती
जिला----जांजगीर -चाम्पा
राज्य---छत्तीसगढ
विधा---कविता
शीर्षक --- सफर
सफर होता अकेला, कोई साथ नहीं मिलता ।
चलते हैं अपने राह में, कोई बात नहीं मिलता ।
कांटे मिले या फूल, खुद को ही पाना है ।
रिश्ता बने या टूटे, खुद को निभाना है ।
किसी की मर्जी से , कोई यहां नहीं चलता ।
ऊंचाईयों में चढ़ो,या खाइयों में गिरो।
अकेले ही रहोगे , जहां भी तुम फिरो ।
कुछ खोओ या कुछ पाओ, कोई नहीं पूछता।
लाख तमन्ना रखलो,दूसरा नहीं मानेगा ।
जिसे दिल जानता है, उसे दिल ही जानेगा ।
तुम रोते रहोगे, ये दुनियां चुप रहकर है हंसता ।
जो मिलते हैं मतलब के,मतलब तक ही ।
मतलब खत्म हुआ, साथ साथ सब भी ।
पल भर का साथ चाहो,तो भी कोई नहीं रुकता ।
हर बात की परीक्षा, यहां हो जाती है ।
देख लेना विपरीत ही, परिणाम लाती है ।
मन में प्यास बना रहता, कभी नहीं बुझता ।
गिरधारी लाल चौहान
व्याख्या ---कवि के द्वारा जीवन के सफर में अकेले पन की कल्पना की गई है , कोई साथ नहीं देने की बात कही गई है ।
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