Thursday, July 23, 2020

जांजगीर-चांपा से गिरधारी लाल चौहान की रचना:- सफर

नाम----गिरधारी लाल चौहान
स्थान-----नवापाराखुर्द/सक्ती
जिला----जांजगीर -चाम्पा
राज्य---छत्तीसगढ
विधा---कविता
शीर्षक --- सफर
 
सफर होता अकेला, कोई साथ नहीं मिलता ।
चलते हैं अपने राह में, कोई बात नहीं मिलता ।

कांटे मिले या फूल, खुद को ही पाना है ।
रिश्ता बने या टूटे, खुद को निभाना है ।
 किसी की मर्जी से , कोई यहां नहीं चलता ।

ऊंचाईयों में चढ़ो,या खाइयों में  गिरो।
अकेले ही रहोगे ,  जहां भी  तुम फिरो ।
कुछ खोओ या कुछ पाओ, कोई नहीं पूछता।

लाख तमन्ना रखलो,दूसरा नहीं मानेगा ।
जिसे दिल जानता है, उसे दिल ही जानेगा ।
तुम रोते रहोगे, ये  दुनियां चुप रहकर है हंसता ।

जो मिलते हैं मतलब के,मतलब तक ही ।
मतलब खत्म हुआ, साथ साथ सब भी ।
पल भर का साथ चाहो,तो भी कोई  नहीं रुकता ।

हर बात की परीक्षा, यहां हो जाती है ।
देख लेना विपरीत ही, परिणाम लाती है ।
मन में प्यास बना रहता, कभी नहीं बुझता ।

गिरधारी लाल चौहान

व्याख्या ---कवि के द्वारा   जीवन के सफर में अकेले पन की  कल्पना की गई है ,  कोई साथ नहीं देने की बात कही गई है ।

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