कवि - संदीप सिंधवाल
राज्य - रुद्रप्रयाग उत्तराखंड
शीर्षक - ग़ज़ल -आंखों के किनारे ठहरा एक आंसू
तेरे इश्क का बुखार कभी मुझे भीगने भी नहीं देता
आंखों के किनारे ठहरा आंसू गिरने भी नहीं देता।
यही मान के चला था कि प्यार ही सब कुछ है
और दुनियादारी के उसूल सीखने भी नहीं देता।
घंटों तक बैठ जाता हूं एक शजर की छांव में
तेरा इंतज़ार मुझे उधर से हिलने भी नहीं देता।
तकल्लुफ तो हुई थी तेरे इश्क में गिरने के बाद
गिरा तो गिरा रह गया मुझे उठने भी नहीं देता।
आंखें चुराकर ही देखता रहा है तुझे 'सिंधवाल'
जमाने का शक तुझे जी भर देखने भी नहीं देता।
संदीप सिंधवाल
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