जिला :- महासमुंद
प्रदत्त कहावत :- अलख हरि की माया, कहीं धूप कहीं छाया।
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- कहीं धूप कहीं छाया।
खोल दुकान कपड़ों का जोगी,
कपड़े बेचे बाजार में,
बेंच बेंचकर जाने कितने,
रूप देखे संसार में।
आज हुआ दुकान में उसके,
अविश्वसनीय अजूबा एक,
खुला ही रह गया मुख उसका,
बैठे रह गया निज कर टेक।
एक चमचमाती गाड़ी आकर,
रूकी दुकान के सम्मुख में,
पहने सुंदर साड़ी निकली महिला,
आई जोगी के दुकान में।
कहती सुनो ओ जोगी जी,
सस्ती सी एक साड़ी दे दो,
नौकरानी की बेटी की शादी है,
कोई पुरानी वाली दे दो।
लेकर सस्ती साड़ी वह तो,
चल पड़ी बड़े ही शान से,
तेज कदमों से निकल पड़ी वह,
जोगी के दुकान से।
कुछ ही पल में बुढ़िया आई,
पहन रखी थी तंग साड़ी,
कहे मालकिन की बेटी की शादी,
दे दो मुझे कोई मंहगी साड़ी।
मंहगी साड़ी लेकर जब,
बूढ़ी महिला चली गई,
पीछे जोगी के मन में वह,
कई प्रश्न है छोड़ गई।
सोंचा जोगी मन ही मन में,
कैसी "अलख हरि की माया",
बात पुरानी सत्य हो गई,
कहीं धूप कहीं छाया।
व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने "अलख हरि की माया, कहीं धूप कहीं छाया।" कहावत का प्रयोग करते हुए अमीरों और गरीबों की सोंच में अंतर को प्रकट करने का प्रयास किया है।
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