स्थान--बंजारी , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--'अलख हरि की माया , कहीं धूप कहीं छाया'
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दुःख-सुख के संयोग से है , सारी दुनिया बनाया ।
है बड़ी अलख हरि की माया , कहीं धूप कहीं छाया ।।
जड़-चेतन गुण-दोषमय रचे , अलख हैं लीलाधारी ,
पहाड़ - पठार बनाये कहीं , सिंधु हैं गभीर भारी ।
प्रचण्ड धूप करते वे कहीं , घने बादल है छाया ।।
है बड़ी अलख हरि की माया , कहीं धूप कहीं छाया ।।
ठण्ड शीतलतामय बनाया , आग में भारी ज्वाला ,
विशाल सरिता बनाया कहीं , कहीं छोटा-सा नाला ।
ग्रह-नक्षत्र को बनाया वही , चाँद-सूरज चमकाया ।।
है बड़ी अलख हरि की माया , कहीं धूप कहीं छाया ।।
जल-थल-गगन में विचरते हैं , अनेक - से जीवधारी ,
काया सिरजे पंच तत्व से , तकनीक भारी न्यारी ।
हाड़ - मांस के ऊपर उसने , सुन्दर चमड़ी चढ़ाया ।।
है बड़ी अलख हरि की माया , कहीं धूप कहीं छाया ।।
किसी को गौर वर्ण दिये हैं , देदी किसी को काला ,
भिन्न - भिन्न साँचे में उसने , जीवधारी को ढाला ।
मीठी-कड़वी चीजों को भी , उसने ही तो बनाया ।।
है बड़ी अलख हरि की माया , कहीं धूप कहीं छाया ।।
कोई विद्वान मूर्ख कोई , वैभवपति पुँजीवाला ,
उसने ही बनाया जहां में , अनेक कटोरावाला ।
किसी को अलख हँसाते रहे , अनेक को है रुलाया ।।
है बड़ी अलख हरि की माया , कहीं धूप कहीं छाया ।।
अद्भुत लीला अलखनाथ की , विचित्र रही है माया ,
दुःख से दुःखी रहा कोई , सुख से खूब बौराया ।
ऐसी माया 'ठाकुर' उनकी , विश्व जान नहीं पाया ।।
है बड़ी अलख हरि की माया , कहीं धूप कहीं छाया ।।
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व्याख्या--इस कविता में अलख हरि की अलौकिक
शक्ति एवं उनकी रचना भिन्नता का वर्णन
करने का प्रयास किया गया है ।
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