Wednesday, July 1, 2020

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- अलख हरि की माया

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--बंजारी , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--'अलख हरि की माया , कहीं धूप कहीं छाया'
                            ०×××××××०
दुःख-सुख  के  संयोग  से  है , सारी  दुनिया बनाया ।
है बड़ी अलख हरि की माया , कहीं धूप कहीं छाया ।।
जड़-चेतन  गुण-दोषमय रचे , अलख हैं  लीलाधारी ,
पहाड़ - पठार   बनाये   कहीं , सिंधु  हैं गभीर भारी ।
प्रचण्ड  धूप  करते  वे   कहीं , घने  बादल  है छाया ।।
है बड़ी अलख हरि की माया , कहीं धूप कहीं छाया ।।
ठण्ड   शीतलतामय   बनाया , आग में भारी ज्वाला ,
विशाल सरिता  बनाया कहीं , कहीं  छोटा-सा नाला ।
ग्रह-नक्षत्र  को  बनाया  वही , चाँद-सूरज चमकाया ।।
है बड़ी अलख हरि की माया , कहीं धूप कहीं छाया ।।
जल-थल-गगन में विचरते हैं , अनेक - से जीवधारी ,
काया   सिरजे  पंच  तत्व  से , तकनीक भारी न्यारी ।
हाड़ - मांस  के  ऊपर  उसने , सुन्दर चमड़ी चढ़ाया ।।
है बड़ी अलख हरि की माया , कहीं धूप कहीं छाया ।।
किसी को  गौर  वर्ण  दिये हैं , देदी किसी को काला ,
भिन्न - भिन्न  साँचे  में  उसने , जीवधारी  को  ढाला ।
मीठी-कड़वी  चीजों  को भी , उसने ही  तो  बनाया ।।
है बड़ी अलख हरि की माया , कहीं धूप कहीं छाया ।।
कोई    विद्वान    मूर्ख   कोई , वैभवपति पुँजीवाला ,
उसने   ही  बनाया   जहां  में , अनेक   कटोरावाला ।
किसी को अलख  हँसाते रहे , अनेक को है रुलाया ।।
है बड़ी अलख हरि की माया , कहीं धूप कहीं छाया ।।
अद्भुत लीला अलखनाथ की , विचित्र  रही है माया ,
दुःख   से  दुःखी   रहा  कोई , सुख से  खूब बौराया ।
ऐसी   माया  'ठाकुर'  उनकी , विश्व जान नहीं पाया ।।
है बड़ी अलख हरि की माया , कहीं धूप कहीं छाया ।।
                         ०××××××०
व्याख्या--इस कविता में अलख हरि की अलौकिक
              शक्ति एवं उनकी रचना भिन्नता का वर्णन
              करने का प्रयास किया गया है ।

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