प्रवीण कुमार ठाकुर
राजनांदगांव, छत्तीसगढ़
*विषय - पत्थर*
*विधा - दोहा छंद*
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शिल्पकार मूरत गढ़े, पत्थर दे आकार ।
कृपा करे शिवनाथ तो,सपने हो साकार ।।
घात हिया में जो सहे, धरते पाहन रूप ।
विशद भाव जन पूजते,करे दीप अरु धूप।।
पत्थर माने देवता , पूज रहे संसार ।
भोले पालनहार है, करते अरि संहार ।।
शील भाव जिसमे नही ,नर है शैल समान।
नम्र भाव उर जो धरे , करते जन सम्मान ।।
आदि काल से हो रहा,पाहन का उपभोग ।
जैसे चाहा भोगते , बनते जैसे योग ।।
*प्रवीण कुमार ठाकुर* ✍🏻
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