स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता { छत्तीसगढ़ी भाखा म }
शीर्षक--' पर्रा भर लाई '
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जुरमिल के सब करव कमाई ।
गरीबी ह मिट जाहि ग भाई ।।
सुमता म जग के सुख बसे हे ।
पूर जाहि पर्रा भर लाई ।।१।।
जाँगर ओतिहा जग हँसाई ।
जोर के रखिहव पाई-पाई ।।
मेहनत म लछमी के बासा ।
कम नोहय पर्रा भर लाई ।।२।।
छोड़व नसा - दारू पियाई ।
नसा नास के जड़ हे भाई ।।
घर - परिवार ल ए तोड़े ।
नइ पूरय पर्रा भर लाई ।।३।।
बइठे - बइठे घर म खवाई ।
करे बिना कुछु काम-कमाई ।।
कुबेर के भण्डार सिराहीं ।
कतक हवै पर्रा भर लाई ।।४।।
करत रहव कमाई - धमाई ।
कका-बबा सब भतिजा-भाई ।।
कमाहा तभे खाये पाहा ।
कय दिन के पर्रा भर लाई ।।५।।
भाग गढ़े पसीना गिराई ।
चारों मुड़ा मिलथे बड़ाई ।।
हाथ धरे 'ठाकुर' मत बैठा ।
बहुत हवय पर्रा भर लाई ।।६।।
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व्याख्या--'पर्रा भर लाई' के महिमा ल मयँ ह अपन
मति के अनुसार बरनन करेके परयास करे
हवँ ।
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