Tuesday, July 21, 2020

बलौदाबाजार से संतराम कुम्हार जी की कविता:-अधूरे ख्वाब

रचनाकार -  संतराम कुम्हार 
   जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.) 
   शीर्षक  -  " अधूरे ख्वाब "
     विधा - छंदमुक्त  
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कुछ ख्वाब जिंदगी में 
अधूरे रह जाते हैं। 
हालातों के बोझ तले, 
न जाने क्यों सिमट जाते हैं।। 
आसमान छूना तो मैं भी चाहता था, 
जिम्मेदारियों का जंजीर पैर में जकड़ जाते हैं।। 

कैसे करूँ मैं बयाँ, 
इस अंदरुनी दर्द को। 
कैसे निभाना बंद करूँ, 
अपने ही फर्ज को।। 
ख्वाब अक्सर ख्वाब ही रह जाते हैं। 
हकीकत से दूर जब खूद को ओ पाते हैं।। 

सपने तो मैंने भी देखे थे,
महलों में जिंदगी जीने का। 
राजकुमार-सा, 
स्वादिष्ट खान-पीने का। 
महलों का नींव पलभर में ही ढह जाते हैं। 
खण्डहर ख्वाब के यही फिर कहलाते हैं।। 

उम्मीदें तो बहुत सी थी 
मुझे अपने ख्वाब पर। 
गम के अंधेरी दुनिया को,
शमा से आफताब कर।। 
काली रातों में कहाँ मंजिल नजर आते हैं। 
गाँव में बूने ख्वाब अक्सर शहर में  टूट जाते हैं।। 

 
दर्द का सैलाब उमड़ पड़ा उस दिन, 
जब सपने हुए मेरे दफन। 
क्यों हारा मैं इन हालातों से, 
कैसे करूँ अब मैं मनन।। 
डूबा सूरज फिर से निकल आते हैं। 
अपनी रौशनी से सबको जगा जाते हैं।। 

सपनों की इस माला से, 
एक मोती ही तो टूटा है। 
हिम्मत रख फिर से संवर जायेगी, 
धागा तो अब भी जूटा है।। 
धीरज से सब काम बन पाते हैं। 
हाथों से तारे भी चुन लाते हैं।।                                   
     
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2 comments:

  1. Sach mama ji...
    Kuchh khwab adhure rah jate hai...

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  2. सपनों की इस माला से,
    एक मोती ही तो टूटा है।
    हिम्मत रख फिर से संवर जायेगी,
    धागा तो अब भी जूटा है।।
    धीरज से सब काम बन पाते हैं।
    हाथों से तारे भी चुन लाते हैं।।

    बहुत ही सुंदर लाइन है ������

    ReplyDelete

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