स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- आलेख
शीर्षक -"शिक्षा : वर्तमान परिदृश्य"
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शिक्षा : वर्तमान परिदृश्य
शिक्षा किसी भी व्यक्ति समाज या राष्ट्र का आधार होता है। एक शिक्षित व्यक्ति से एक शिक्षित समाज का ,और एक सुनियोजित राष्ट्र का निर्माण होना लाजमी है ।
हमारा भारत देश सैकड़ों वर्ष की गुलामी की जंजीरों से जकड़ा हुआ था। ब्रिटिश काल में मैकाले की शिक्षा प्रणाली की रूपरेखा एक क्लर्क बनाने की थी। देश के स्वतंत्र होने के बावजूद भी उसी ढ़र्रेे में शिक्षा का संचालन होना हमारे देश के लिए बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय रहा ,क्योंकि वही पद्धति स्वतंत्रता के बाद भी वर्षों से चली आ रही थी ।इसके दुष्परिणाम आज हमें कई वर्ष पीछे की ओर लेके चले गए।
अभी वर्तमान की बात करूं तो मैं संतुष्टि की सांस नहीं ले पा रही हूं ,क्योंकि भले आज मोदी जी डिजिटलाइजेशन पर काम कर रहे हैं । तकनीकी ज्ञान पर जोर दिया जा रहा है पर जहां तक मुझे मालूम है, कि हमारे देश का एक बड़ा तबका है जो इन सब से कोसों दूर है उसे ना तो मेल करना आता है, ना फैक्स और ना ही नेट की जानकारी है।
मैं एक शिक्षक हूं और चूँकि इन दिनों कोरोना उधम मचा रहा है तो सरकार बच्चों को "पढ़ाई तू हर द्वार" योजना के तहत ऑनलाइन क्लास के माध्यम से पढ़ाने का बीड़ा उठाई है। चूँकि मैं एक शिक्षक हूं अतः मैं भी ऑनलाइन क्लास के माध्यम से बच्चों को पढ़ा रही हूं। कक्षाएं संचालित कर रही हूं , और मैं आपको बताना चाहती हूं कि मेरे स्कूल के 162 बच्चों में सिर्फ 10 से 12 बच्चे ही ऑनलाइन क्लास अटेंड कर रहे हैं ,या कहूं कि अटेंड करने में सक्षम है । फिर इसके पीछे कारण कोई भी हो चाहे एंड्राइड मोबाइल का ना होना ,मोबाइल में डाटा का ना होना या मोबाइल से जुड़ना ना आता हो ।
शिक्षा का बदलता स्वरूप नजर तो आ रहा है मगर यह सिर्फ नजरों तक सीमित है । जिसे अधिकारिक प्रक्रियाओं में कागजों पर लिखा जाता है ।इन्हें जमीनी तौर पर उतरने में अभी और कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी ।मुझे बहुत दुख होता है जब एक मोबाइल पर बच्चा पब्जी खेलते हुए अपनी जान गवा देता है । मैं समाज से एक प्रश्न करना चाहती हूं या कहूं कि हमारी सरकार से एक प्रश्न करना चाहती हूं कि क्या हमें इस बदलते स्वरूप में एक सख्त निरीक्षण टीम की आवश्यकता नहीं है ? जो ये देखें कि शिक्षा के क्षेत्र में जो अनगिनत सरकार की योजनाएं चलाई जा रही हैं , वह फलीभूत हो रही है कि नहीं और यदि नहीं हो रही हैं ,तो क्यों नहीं हो रही हैं ?
बच्चे चंद पाठ्यक्रमों को रटकर 100% ले आते हैं ।वह भी मात्र गिने-चुनें छात्र और सरकारी नौकरी में घुस जाते हैं।और बचे हुए छात्रों को न नौकरी मिलती है और ना ही वे अपनी जीविकोपार्जन हेतु खड़े हो पाते हैं। जीवन जीने के कौशल में कहीं ना कहीं बहुत पीछे छूट जाते हैं।
मेरी इस समाज से और हमारे शिक्षाविदों से एक इल्तजा है कि हमें वही पुरानी पद्धति की शिक्षा पर काम करनी होगी।एक नए युग की स्थापना करनी होगी जहां जीवन मूल्यों की शिक्षा दी जाए ,ताकि विकट परिस्थितियों में व्यक्ति के पैर न लड़खड़ाए वह हर मुश्किल में जीवन जी सके और एक योग्य नागरिक बनकर देश को योग्यता के शिखर तक ले जा सके ।
सत्य एवं सुंदर लेख
ReplyDeleteSahi kaha Madamji👍
ReplyDeleteVery nice
ReplyDeleteबहुत सुंदर समाधान ।भारतीय शिक्षा पद्धति ही श्रेयस्कर है ।
ReplyDeleteसही व सुन्दर लेख है
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