Saturday, July 25, 2020

लाहड़ दातु,साहाब मलेशिया से कवि डॉ गुरिंदर गिल जी की कविता:-साहिल पर घर बनाने लगे हैं

नाम; डॉ गुरिंदर गिल
लाहड दातु, साबाह,
मलेशिया। { अभी इन दिल्ली }

साहिल पर घर बनाने लगे है 

कौन हूँ मैं क्या हूँ मैं ऐ ज़िंदगी तू ही बता 
खुद का पता ढूंढ़ने में हमे ज़माने लगे है 
बहुत दर्द है मोहबत में तेरी ऐ जान ए जाना 
फिर भी दर्द संग हम वफ़ा निभाने लगे है।

धीरे धीरे थमेंगे आंसू दास्ताँ कहेंगे आंसू 
दुनिया से जो हम आजकल छुपाने लगे है 
फुट रहे है सब शरारे बीती यादों के अंगारे 
कुरेद दिल की राख जो हम उड़ाने लगे है।

आरज़ू हसरत उम्मीद शिकायत आंसू 
जिक्र तेरे पर क्या क्या हम सजाने लगे है 
मोहबत की है न हद्द कोई दर्द का हिसाब क्यों
फिर भी ज़माने वाले गिनने गिनाने लगे है।

दर्द दिल में है दुआ करे न दवा करे कोई 
ज़ख्मों से हम खुद को मिलवाने लगे है 
उन्हें अपनाने की ज़िद्द उन्हें पाने की ज़िद्द  
तूफानों बीच साहिल पर घर बनाने लगे है।

ज़ख़्म है नासूर बने जब से है वह मगरूर बने 
प्रीतम प्यारे निकले प्रेम नदी खंगालने लगे है 
उठा आँखों की फ़िज़ूल खरचिओ पर सवाल 
उफ़्फ़ आंसू जो दिन रात हम बहाने लगे है।

स्वरचित 
डॉ गुरिंदर गिल
दिल्ली - 56
इंडिया

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