जिला-कांकेर,छग
शीर्षक- गांव
विधा-कविता (मुक्त छंद)
टूटी-फूटी खपरैल का घर,
दिखते खेतों में चलते हल।
घास-फूंस की झोपड़ियों में,
बुधारु-बुधिया के गांव में।
अपने पन की मिठास लिए,
भुट्टे और गन्ने की ठांव में।।
धान का कटोरा सोनहा बाली,
अर- अर तता हाथ में कुदाली।
पीपल पेड़ के उस घने छांव में,
नरवा के तीर गौरी के गांव में।।
है अपना प्यारा हिन्दुस्तान कहां,
वह तो बसा है हमारे गांव में।।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर, छग
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