रायपुर, छत्तीसगढ़
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मन कागज़ की नाव
मन काग़ज़ की नाव
बह जाना चाहता है...
वहाँ... जहां उसे कोई नहीं जानता
लहरों से उलझता
मिल जाएगा उसे सहारा ...
पर अपनों की उलझनों का
नहीं कोई किनारा
लाख कवायदें कर ले...कोई नहीं मानता
मन कागज़ की पतंग...
उड़ जाना है चाहता ...
डोर फिर भी कहीं अटकी है..
बेख़बर नहीं.... है वो जनता..
कभी बयारों के संग
बादलों में छुप के...
देखना है चाहता...
उसके नाव या पतंग बनने पर
क्या कोई अफसोस है जताता ...
किसी की खामोश आँखे
क्या ढूँढ़ती है अक्स उसका
क्या किसी के दिल में अब भी
टीसता है दर्द उसका
मन बड़ा अनमना हो कर
सोच में पड़ जाता है
ग़र जो ये सब ना हुआ तो..
खामख्वाह पछताएगा...
मन बड़ा बेमन सा हो कर
सिमट के रह जाता है...
रश्मि...
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