जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
विषय :- छत्तीसगढ़ के महापुरुष।
अलंकार :- श्लेष अलंकार
शीर्षक :- सोनाखान के सोना
थे सोनाखान के सोना वे,
कांपे अंग्रेज जिनके नाम से,
भूखों के पेट जो पाले,
बहुचर्चित थे वे काम से।
छाया जो घनेरा अंधेरा,
बनकर दीप किया उजियारा,
मर मिटा मातृभूमि के खातिर,
था जो मां - बाप के आंखों का तारा।
जो संकट आई उनकी प्रजा पर,
गाडा खजाना लूट गए,
जो राह में दुश्मन आए,
ऊपर उनके टूट गए।
स्वराज पाने को वे तब,
जीवन बसंत भी भूल गए,
अंक लगा ली मौत को अपनी,
हंसते - हंसते झूल गए।
व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने छत्तीसगढ़ के वीर सपूत शहीद वीर नारायण सिंह जी की वीरता का बखान करने का छोटा सा प्रयास किया है।
साथ ही काव्य अलंकरण के लिए श्लेश अलंकार का प्रयोग किया है यथा -
पहली पंक्ति में "सोना" के दो अर्थ हैं एक है धातू, और दूसरा अनमोल सपूत।
"बनकर दीप किया उजियारा में" दीप का अर्थ दीपक है साथ ही दुख को हरने वाला।
"जीवन बसंत" का एक अर्थ बसंत है तथा दूसरा अर्थ है अच्छे दिन या सुखमय जीवन।
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