नाम-अनुरमा शुक्ला,दुर्ग
शीर्षक-अलख हरी की माया
कभी धूप तो कभी छाया
*अलख हरी की माया*
*कभी धूप तो कहीं छाया*
खोज ना गली-गली तु भगवान
वह तो कण-कण में समाया ।
कभी धूप कभी छांव है जिंदगी,
सुख-दुख दोनों साथ चलेंगे,
कभी काँटे , कभी फूल मिलेंगे,
जीवन की ये रित सहनी होगी।
कभी जीत तो कभी हार होगी,
हर हार के बाद उम्मीद मिलेगी,
मुश्किलों से डरकर रुकना नहीं,
जीवन-रुपी नैया तभी पार होगी।
आज निराशा का दौर है आया,
कल आशा का उजाला होगा,
अलख हरी की माया,
कभी धूप तो कहीं छाया।
अनुरमा शुक्ला
दुर्ग(छ.ग.)
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