रचनाकार _सावित्री यादव "सावि "
बिलासपुर छ. ग.
शीर्षक -वही तो गाँव है |
गाँव तो गाँव है |जहाँ मिलता शीतल छाँव है |
जहाँ अपनापन और प्यार है | वही तो गाँव है |
जहाँ पर होते बड़े बूढ़ो का जमघट , होती है |
पुरे गाँव समाज की बाते और होती है|
रोज आपस में उनकी मुलाकाते |
जहाँ अपनापन प्यार है |वही तो गाँव है |
बच्चों को प्यार संस्कार देता पूरा परिवार है |
बड़े बूढ़ो के होते छोटो को ना होता क़ोई भार है |
जहाँ अपनापन प्यार है |वही तो गाँव है |
हंसी की गूंज से खिलखिलाता पूरा घर है |
और शिकायतों की रोज बौछार है |
जहाँ अपनापन प्यार है | वही तो गाँव है |
सखियों संग झूला और मड़ई और मेला |
आपस में मेला मिलाप ना क़ोई अकेला |
जहाँ अपनापन प्यार है |वही तो गाँव है |
सब्जी से शुरू होकर मायके ससुराल पर बाते खत्म होती है और जहाँ हँसी ख़ुशी के साथ दिन की शुरुवात होती है |
जहाँ अपनापन प्यार है | वही तो गाँव है |
बसता जहाँ खुशियों का संसार है |
मिलता जहाँ केवल प्यार है |वही मेरे गाँवका घर परिवार है|
जहाँ अपनापन प्यार है | वही तो गाँव है |
भावर्थ _ गाँव की विशेषता का वर्णन |
रचनाकार _ सावित्री यादव "सावि"
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