कवियित्री -चंदा प्रहलादका
शहर -कलकत्ता
Salt Lake City
ग़ज़ल
ग़म को जीवन से यूँ मिटाना होगा,
जीत का जश्न अब तो मनाना होगा ।
दाँव उलट ही गया,शौक़ करूँ तो क्या ,
एक बार फिर से आज़माना होगा ।
राह टिकी,बुनियाद काँटों की तो क्या ,
सोई क़िस्मत को भी जगाना होगा।
दर्द पलक में अश्क बन छलके तो क्या,
तसब्बुर में प्यार का ख़ज़ाना होगा।
लड़खड़ाते कदम,जो पी गये तो क्या ,
जाम नज़रों का वो पैमाना होगा ।
रूह तुममें समा जाये नशा तो क्या,
तुमको तुमसे ही अब चुराना होगा ।
दास्ताँ प्यार की दिल छुपा रखे तो क्या,
बागे जन्नत को भूल जाना होगा ।
इज़हारे इश्क़ ज़ुबां ख़ामोश तो क्या ,
मासूम इशारों से जताना होगा ।
अजीयत दिल की तड़प बन गई तो क्या,
अरमां ख़ाक में मिले बचाना होगा ।
सजदा हो यकी को जमीं मिली तो क्या ,
मेरे हमसफ़र हसीं ठिकाना होगा ।
चंदा प्रहलादका
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