Friday, July 24, 2020

रायगढ़ से गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न" की रचना- संस्कार

रचनाकार-गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विषय-संस्कार पर आधारित
विधा- छंद मुक्त
शीर्षक- *संस्कार*
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संकरे गलियों में जरूरत है सम्हलने की,
विपरीत हवाओं संग कभी मचलने की ।
किस स्केल से मापोगो सारा जीवन?
संस्कार तहजीब है तबीयत से तोलने की ।।

संस्कार एक विचार है बचपन को पालने की,
संरक्षक पिता और मॉं की ममता उड़ेलने की ।
हर कोई किसी गुमॉं में दिखता है,
संस्कार आदत है स्नेह सादर बोलने की ।।

संस्कार रूढ़ियों पीढ़ियों का ख्यालात है साहब,
जात-पात,रंग-रूप का मुलाकात है साहब ।
आसमॉं छूने वाले पेड़ कट गए जंगल में,
झुके पेड़ ही बचे हैं देखो क्या बात है साहब ।।

रुक कर बोलना,बातों में भी आघात है साहब,
व्यक्तित्व ही है वर्ना कहॉं कोई औकात है साहब ।
साथ चलो तो परवरिश भी साथ चलती है,
मुखारविंद में बसती जज्बात है साहब ।।

कृष्ण-राम का बचपन भी सीख देता है,
संस्कार से भविष्य हस्त-लकीरों में लिख देता है ।
कर्म को धर्म का मर्म जानो,
वर्ना खुदा वैमनस्य,भीरूता का भीख देता है ।।

कैलेंडर नहीं जीवन जो तारीख पर तारीख देता है,
वजूद स्वयं में उत्साह उल्लास सा चीख देता है ।
जीवन में जीवन हो तो सुभानल्लाह,
वर्ना जीव में जीवन मृत्यु सरीक देता है ।।

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गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न" 
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

16 comments:

  1. बहुत सुन्दर 👌👌👌👌

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