Wednesday, July 15, 2020

बालोद से यूरेका योगी की कविता:- पैसों की चाहत

कवयित्री- यूरेका योगी
जिला- बालोद(छत्तीसगढ़)
शीर्षक- पैसों की चाहत

न रिश्तों की खबर है,
न अपनों में प्यार है,
अंधे हो गये है लोग,
बस! पैसों की चाहत में।
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मां बाप को मार रहे हैं,
धन दौलत की लालच में,
भाई - भाई लड़ रहे हैं,
बस! पैसों की चाहत में।
"""""""""""'"""""""""""""""
परिवार से दूर....,
अपनों से बेखबर,
अपने आप में तनहा जी रहे,
बस! पैसों की चाहत में।
""""""""""""''''"""""""""""""
बच्चों को अगवा करते,
सड़को में भीख मंगवाते,
दो रोटी को तरसातें,
बस! पैसों की चाहत में।
"'""""""""""""""""""""""""""
बड़े - बड़े कारखाने खुलवाते,
गरीबों की बस्तियां उजड़वाते,
सड़को में रहने को बाध्य कर देते,
बस! पैसों की चाहत में।
""""""""""""""""""""""""""''
पैसों की भूख तो कभी मिटती ही नहीं है,
पर दो रोटी से गरीबों की भूख मिट जाती है,
उसे भी छिन लिया जाता है,
बस! पैसों की चाहत में।
  
     -- यूरेका योगी --
    बालोद, छत्तीसगढ़

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