जिला- बालोद(छत्तीसगढ़)
शीर्षक- पैसों की चाहत
न रिश्तों की खबर है,
न अपनों में प्यार है,
अंधे हो गये है लोग,
बस! पैसों की चाहत में।
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मां बाप को मार रहे हैं,
धन दौलत की लालच में,
भाई - भाई लड़ रहे हैं,
बस! पैसों की चाहत में।
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परिवार से दूर....,
अपनों से बेखबर,
अपने आप में तनहा जी रहे,
बस! पैसों की चाहत में।
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बच्चों को अगवा करते,
सड़को में भीख मंगवाते,
दो रोटी को तरसातें,
बस! पैसों की चाहत में।
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बड़े - बड़े कारखाने खुलवाते,
गरीबों की बस्तियां उजड़वाते,
सड़को में रहने को बाध्य कर देते,
बस! पैसों की चाहत में।
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पैसों की भूख तो कभी मिटती ही नहीं है,
पर दो रोटी से गरीबों की भूख मिट जाती है,
उसे भी छिन लिया जाता है,
बस! पैसों की चाहत में।
-- यूरेका योगी --
बालोद, छत्तीसगढ़
Bhehtrin mahodya ji
ReplyDeleteBhahut achi suruvat
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