Wednesday, July 15, 2020

रायगढ़ से गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न" कृत रेखाचित्र:- गली की गंदगी

रचनाकार-गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
जिला- रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विषय-गांव के संबंध में शब्द चित्र
विधा-रेखा चित्र
शीर्षक- "गली की गंदगी"
**************************
लगभग छ: महीने बाद पिंटू दूर शहर से अपने पैतृक गांव में आ रहा था, बाइक जंगलों की घनी आबादी को चीरता हुआ मानो हवा से गुफ्तगू कर रहा था,रस्ते भर सर्र-सर्र कर सरसराती हवा जैसे ही उसके गालों को चूमने लगती थी, उसे गांव की वही महक इस अहसास में महकाने लगती थी । बारिश की हल्की- हल्की बौछारें हल्की नमी के साथ और मदहोश कर रही थी । गांव की वो गलियां हंसते गाते झूमते हुए जैसे उसे बुला रहे हों।बच्चों और बुजुर्गों से गहरा रिश्ता था,दोस्त होने के नाते सबकी यादें उसे बीच-बीच में हंसाती जा रही थी। मां का आलिंगन पापा का गुरुर से देखना तो भाई के साथ कुछ पल बिताना हंसी ठिठोली और क्रिकेट खेलना सब यादें एक साथ किसी फिल्म की तरह मन मस्तिष्क में घूमने लगे थे । सारी ख्वाहिशों को एक अंजाम देने के लिए उसने क्रमशः क्रमिक रूप से योजना बना रखे थे।
         अब रिमझिम बारिश घनघोर घुमड़ती मेघ गर्जना के साथ तेज बरसात का रुप ले चुकी थी, पूरा सफर भी अंत की ओर था । गांव के नजदीक पहुंचते ही वो प्रतीक्षालय जिसे न जाने कितने सपनों में उसने देखा था उसे ठहरने को थोड़ा रुकने को कहने लगे थे। पर गलियों में फैली हुई गंदगी और कीचड़ से भरी हुई सड़क, सहसा उसके मन को व्यथित करने लगे थे सारी आकांक्षाएं धरी की धरी रह गई थी चारों ओर फैली हुई पॉलिथीन की कैदियों और उगे हुए ऊंची ऊंची घास और मंडप के थोड़े आगे बीचों-बीच जमी हुई गंदगी से निकलती हुई बदबू चलने वालों को नाक बंद करने के लिए प्रेरित कर रहे थे। पिंटू भला इन सब से गुजरते हुए हंसी खुशी से परिवार जनों से कैसे मिल सकता था? सारे बच्चे उसके पीछे पीछे दौड़ने लगे थे और पिंटू आ गया पिंटू आ गया कह कर मॉं और भाई को बुलाने लगे थे । सबके लिए चॉकलेट देता हुआ पिंटू एक गेम खेलने की बात कह कर सब को मना लिया जिसके लिए बस आधा घंटा का समय तय किया गया था । सभी के हाथों में कुदाल हावड़ा और गंदगी हटाने के लिए कुछ पतीले थमा दिए गए थे, कुछ को गली में घास उखाड़ने का काम, तो कुछ को गंदगी हटाने का सौंपा गया था। सारे बुजुर्ग यह देखकर हतप्रभ थे कि जिनके जुबान पर हमेशा अपशब्दों की भरमार हुआ करते थे, आज वही बच्चे सारा गंदगी और सारा घास, उखाड़ कर दूर कूड़े के ढेर पर जमा कर रहे थे सब के माथे पर हल्की पसीने की धाराएं थी,कोई कमर पकड़ कर बैठे हुए तो कोई अब भी हर हर महादेव का जय कार लगा रहे थे।
    सभी बच्चों को इस खेल में आज बहुत आनंद आ रहा था क्योंकि सारे उलाहने देने वाले आज प्रशंसा कर रहे थे, कोई रोक-टोक ना था और बस 1 घंटे में ही सारा गंदगी दूर होकर गलियों में साफ सफाई का वातावरण छाने लगा था, जैसे आज ही वो नवाखाई का त्यौहार हो जब गांव में रौनक होती है।
        यह सब देख कर पिंटू का मन हर्ष से भर गया और आज पहली बार उसे खुद पर गर्व महसूस हो रहा था । गांव की कुछ औरतें गांव के नरेंद्र मोदी से संबोधित कर रहे थे ।
        यह सत्य ही है की मैं आने वाली युवा पीढ़ी को सही मार्ग प्रशस्त करने का सही तरीका ढूंढना होगा पूरे भारत भूमि का कर्तव्य भार नहीं नन्ने कंधों पर थमा हुआ है । इनमें वही उमंग उत्साह फूंकना होगा । तभी कलाम जी जैसे महान हस्तियों का स्वर्णिम सपना पूरा होगा ।
  
**************************
गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

1 comment:

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...