रचयिता- मोनालिसा बेहरा
लैलूंगा, जिला-रायगढ़
विधा-मुक्त छंद
शीर्षक-कोरोना का साया
(अलख हरि की माया, कहीं धूप कहीं छाया लोकोक्ति का प्रयोग)
अलख हरि की माया,कहीं धूप कहीं छाया
आज कोरोना काल मे,मंडराता डर का साया
कल सात समंदर पार था,आज दहलीज पे मेरे आया
बेख़ौफ़ सी जिंदगी में, ख़ौफ़ बन कर छाया
बेवक्त घर लौटते पुरुषों को ,वक्त का पाठ पढ़ाया
अजनबियों से जो रहते थे कल तक ,उन सब को मिलाया
दूर बसे प्रवासियों को भी,घर का राह दिखाया
अपने तो अपने होते हैं,सबको समझ ये आया
अपमान सहती नारियों का भी,महत्व सबको बताया
नए- पुराने व्यंजनों का भी,सबने स्वाद उठाया
एक कदम स्वच्छता की ओर,सबने कदम बढ़ाया
बार -बार धो के हाथ,कोरोना को दूर भगाया
आज अहमियत प्रकृति की भी,सबको समझ में आया
अलख हरि की माया,कहीं धूप कहीं छाया।
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