***********************************
रचनाकार -- प्रवीण कमार ठाकुर
जिला -- राजनांदगाँव (छ.ग.)
शीर्षक -- तेरी सूरत मानो चाँद हो
विधा -- उत्प्रेक्षा अलंकार (कविता)
***********************************
।।१।।
तेरी सूरत मानो चाँद हो ,
जुल्फ है तेरी काली घटा ।
लट छुटे ज्यौं चेहरे पर ,
देखते बनती है छटा ।
***********************************
।।२।।
बिंदिया ऐसे ललाट पर ,
मानो सूर नभ पर चमके ।
उज्वल ऐसे रुप हो मानो ,
चंद्र बदन ज्यौं दमके ।
**********************************
।।३।।
नैन हो ज्यौं झील गहरी ,
देखते ही डूब से जाते हैं ।
या नीलांबर के आंचल में ,
ज्यौं दो मोती मुस्कातें हैं
**********************************
।।४।।
हरितिमा वसन शुक होत भ्रम ,
तुम मंजुल मंजुल हो लगती ।
श्वेत दंत है , अधरों के मध्य ,
मानो कोई कीर चबाए है मोती ।
***********************************
रचनाकार
प्रवीण कुमार ठाकुर
पतोरा,छुरिया,राजनांदगाँव(छ.ग.)
***********************************
***********************************
व्याख्या :--
प्रस्तुत कविता में रचनाकार ने
सम्पूर्ण पँक्तियों में उत्प्रेक्षा अलंकार का बडा़
मनोरम चित्रण करने का प्रयास किया है ।
जहाँ पर उपमेय में सर्वत्र उपमान का भ्रम
होता है ।
***********************************
बहुत बढ़िया सर
ReplyDeleteबहुत बढ़िया रचना।
ReplyDeleteबहुत अच्छी रचना है
ReplyDeleteजबरदस्त
ReplyDelete