रचनाकार- गुलशन खम्हारी"प्रद्युम्न"
जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विधा-छंद मुक्त (उत्प्रेक्षा अलंकार)
शीर्षक- "जिंदगी को जिंदगी का"(गीत)
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"जिंदगी को जिंदगी का"
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जिंदगी को जिंदगी का बसेरा मिल गया...
रात ढलने लगी फिर से सवेरा मिल गया....
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इस भीड़ में हम कहां आ गए
ढूंढने चले थे हमीं में हम खो गए
हंसते देखा तुम्हें तो इशारा मुझे मिल गया...
जिंदगी को जिंदगी का....
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समय ने कैसी ये कहानी कही
हमने दादी तो कभी नानी कही
है मुश्किल बड़ा समझाना इन्हें,
कथन को मेरी ही नादानी कही
हो गया हूं पक्के घड़े सा कोई,मानो मुझको ठठेरा मिल गया...
जिंदगी को जिंदगी का....
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मां मेरी तुम्हें मैं सदा याद करूं
मिलने की बस तुमसे फ़रियाद करूं
कल को तो गम में मैं जी लिया,
खुशी संग हंसी मैं आज करूं
देखो दिन ढल गई फिर वही अंधेरा मिल गया..
जिंदगी को जिंदगी का...
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वो बचपन की यादें कहां खो गई
बस्ते की पुस्तक कसक बो गई
हम तो हंसने लगे थे यहां
फिर जिंदगी क्यों यहां रो गई
लौट आएं उसी बचपन में हम, कुछ तो हमारा हमें मिल गया...
जिंदगी को जिंदगी का...
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गुलशन खम्हारी"प्रद्युम्न"
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