स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--सार छन्द { कविता }
शीर्षक--'गरीबी रही है कष्टकारी'
अभावग्रस्त जीवन होता , सभी दुःख से भारी ।
निगोड़ी गरीबी जगती में , रही है कष्टकारी ।।
रोज-रोज रहता गरीब को , कमाना और खाना ,
जीवन को सदा कमी में है , पड़ जाता बीताना ।
घर की नैया इनको खेना , लगता निश्चय भारी ।।
निगोड़ी गरीबी जगती में , रही है कष्टकारी ।।१
निवासी झुग्गी-झोपड़ी के , गरीब जीवन सारा ,
दो जून की रोटी के लिए , फिरता मारा - मारा ।
कष्ट है अन्न - वस्त्र जुटाना , साथ चले बीमारी ।।
निगोड़ी गरीबी जगती में , रही है कष्टकारी ।।२
हुआ करता है गरीबी में , जब-जब आटा गीला ,
तब-तब है जुगाड़ करने में ,पड़ जाता वह ढीला ।
धरी की धरी रह जाती है , उसकी कोशिश सारी ।।
निगोड़ी गरीबी जगती में , रही है कष्टकारी ।।३
बच्चों की पढ़ाई-लिखाई , ठीक से न हो पाता ,
पेट - पालने लेकर बच्चे , अन्य राज्य को जाता ।
दाने - दाने के लिए सदा , रखता प्रयास जारी ।।
निगोड़ी गरीबी जगती में , रही है कष्टकारी ।।४
गरीब मेहनत करते रहा , गरीब राष्ट्र सृजेता ,
दूसरे की वह भरे कोठी , खाली खुद रह लेता ।
गरीबी रही है जगती में , खूब बड़ी लाचारी ।।
निगोड़ी गरीबी जगती में , रही है कष्टकारी ।।५
दुःख नहीं गरीब के जैसे , बाबा 'तुलसी' गाये ,
जन्म लेता वह गरीबी में , पलता फिर मर जाये ।
गरीबी 'ठाकुर'अभिशाप है , होती विपदाकारी ।।
निगोड़ी गरीबी जगती में , रही है कष्टकारी ।।६
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व्यख्या--गरीबी की मानव जीवनपर पड़नेवाले
प्रभाव का वर्णन ।
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