Wednesday, June 24, 2020

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- गरीबी

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--सार छन्द { कविता }
शीर्षक--'गरीबी रही है कष्टकारी'

अभावग्रस्त  जीवन  होता , सभी  दुःख  से  भारी ।
निगोड़ी  गरीबी  जगती में , रही     है    कष्टकारी ।।
रोज-रोज रहता गरीब को , कमाना  और   खाना ,
जीवन को सदा कमी में है , पड़   जाता   बीताना ।
घर  की नैया इनको  खेना , लगता  निश्चय   भारी ।।
निगोड़ी  गरीबी  जगती में , रही    है     कष्टकारी ।।१
निवासी  झुग्गी-झोपड़ी के , गरीब   जीवन   सारा ,
दो जून की  रोटी के  लिए , फिरता  मारा  -  मारा ।
कष्ट है अन्न - वस्त्र जुटाना , साथ    चले   बीमारी ।।
निगोड़ी  गरीबी  जगती में , रही     है     कष्टकारी ।।२
हुआ  करता  है  गरीबी  में , जब-जब आटा गीला ,
तब-तब है जुगाड़ करने में ,पड़  जाता  वह  ढीला ।
धरी की  धरी रह  जाती है , उसकी कोशिश  सारी ।।
निगोड़ी  गरीबी  जगती में , रही     है     कष्टकारी ।।३
बच्चों  की  पढ़ाई-लिखाई , ठीक  से  न  हो  पाता ,
पेट - पालने   लेकर  बच्चे , अन्य राज्य को जाता ।
दाने - दाने  के  लिए  सदा , रखता   प्रयास  जारी ।।
निगोड़ी  गरीबी  जगती में , रही     है     कष्टकारी ।।४
गरीब   मेहनत  करते  रहा , गरीब    राष्ट्र   सृजेता ,
दूसरे  की  वह  भरे  कोठी , खाली  खुद  रह लेता ।
गरीबी  रही   है  जगती  में , खूब    बड़ी   लाचारी ।।
निगोड़ी  गरीबी  जगती में , रही     है     कष्टकारी ।।५
दुःख  नहीं  गरीब के  जैसे , बाबा   'तुलसी'   गाये ,
जन्म  लेता  वह  गरीबी में , पलता फिर मर  जाये ।
गरीबी 'ठाकुर'अभिशाप है , होती       विपदाकारी ।।
निगोड़ी  गरीबी  जगती में , रही     है     कष्टकारी ।।६
                           ०×××××०
व्यख्या--गरीबी की मानव जीवनपर पड़नेवाले
             प्रभाव का वर्णन ।

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