जिला :- महासमुंद
विधा :- मनहरण घनाक्षरी (वार्णिक छंद)
अलंकार :- पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार
शीर्षक :- खुद्दार गरीबी
धन से गरीब भले,
पेट - पाट ना हो चले,
फिर - फिर फकीरों का,
पेट वहीं भरे हैं।
दिन रात काज करे,
भले ना अनाज धरे,
पुनि - पुनि जगत में,
दान वहीं करे हैं।
एहसान ना ले कभी,
खुद्दार होते हैं सभी,
निज काज करने को,
नींद चैन वारे हैं।
होते बड़े कर्मठ है,
लोग सोंचे वो सठ हैं,
धीरे - धीरे, धैर्य धरे,
जग को निखारे हैं।
संतान हैं सच्चे वो तो,
दिल के हैं अच्छे वो तो,
इसलिए वसुधा को,
लगे बड़े प्यारे हैं।
नित्य ही कमाते वो तो,
दो जून ही खाते वो तो,
द्वेश - बैर भावना से,
रहे वो किनारे हैं।
व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने एक खुद्दार गरीब के जीवनचर्या का वर्णन किया है। वे कहते हैं कि गरीब भले आर्थिक रूप से गरीब हो लेकिन दिल के अमीर होते हैं।
काव्य अलंकरण के लिए रचनाकार ने विभिन्न स्थानों पर शब्दों की पुनरावृत्ति की है यथा - फिर - फिर, पुनि - पुनि, व धीरे - धीरे जिससे कि पंक्तियों में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार की छटा बिखर रही है।
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