Tuesday, June 16, 2020

छत्तीसगढ़ के रायपुर से -एच-एस-अरमो"अरमान " की रचना- दीवारों के कान

*रचनाकार-एच-एस-अरमो"अरमान "
*निवास-रायपुर,छत्तीसगढ़ ।
*जिला--रायपुर  ।
*शीर्षक-"दीवारों के भी कान होते हैं "
*विधा-कविता (मुक्त-छ्न्द)
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**दीवारों के भी कान होते हैं **
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एक बार कक्षा में,
पढ़ाते ---पढ़ाते--
मैंने देखा--
छात्र,आपस में कनाफूसी कर रहे थे,
मेरा ध्यान अचानक ही,
उनकी ओर गया,
मैंने बोला--
दीवारों के भी कान होते हैं,
आपस में,कानाफूसी मत करो,
कान के,कच्चे नहीं हैं लोग,
न ही कान के बहरे हैं लोग ।
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जमाने की---
तुम्हारी हर हरकतों पर,नजर होतीहै,
तुम सोचते हो---?
कोई नहीं देख रहा ,
यहां कोई नहीं,पहचानता है,
करते,कभी आँख मिचौली ,
तो,कभी चोरी कर लेते हो--
पर ,वह नहीं जानता कि ---
"दीवारों के भी कान होते हैं "  ।
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हर एक इन्सान को--
हरपल ,हर जगह, वह--
नैतिकता का ध्यान रखे,
सामाजिकता में रहकर,
जमाने से,सवाल-जवाब करे ,
जब बात,बिगड़ जाती है,
तब पता चलता है कि--
"दीवारों के भी कान होते हैं " ।
*********इति**************
व्याख्या:--इस रचना के माध्यम से रचनाकार ने यह बताने की कोशिश की है कि समाज की मर्यादा को ध्यान में रखते हुए अपने प्रत्येक कार्यों को सम्पादित करना चाहिए ।
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मौलिक रचना-अरमो,रायपुर छ.ग-।
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