रचनाकार- गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
जिला-रायगढ़ छत्तीसगढ़
विधा-मुक्त छंद
शीर्षक-"दीवारों के भी कान होते हैं"
*दीवारों के भी कान होते हैं*
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मां से ही सुना था मैंने,
कि दीवारों के भी कान होते हैं
बेदर्द दुनिया में यूं ही ना रोना,
आंसुओं में लोगों के छुपे मुस्कान होते हैं
देखो इठलाता रहा दिवाकर सुबह से,
उस नियंता के यहां उदय संग अवसान होते हैं
आंसू ख़ुशी में सम दर्शिता रखना,
जिंदगी में अक्सर जिंदगी के अनुसंधान होते हैं
जो बने हो मां के दामन के फूल,
अपने खुशबू में मशगूल न रहना महकते हुए कांच के इत्रदान होते हैं
जो पौधे घूरने लगे थे आसमां को,
उनके ही जनाजे पर खड़े खलिहान होते हैं
हरकारा हांकने न आएगा यहां,
सतर्क रहो यहां ऐसे ही मतदान होते हैं
सहेज कर जो रखे थे तिजोरी में,
उन्हीं उपाधियों से सजे कूड़ेदान होते हैं
करना है तो सत्कर्म से कर्म करो,
कर्मशील कर्मठ ही महान होते हैं
बहुत दर्प घमंड से जीवन न जी जाना
गुरुर से निकले कंधों वाले कब्रिस्तान होते हैं
हर गम भुला कर गम पी जाओ,
सदा कैलाश में नहीं जीवन में भी विषपान होते हैं
पीकर भंग भांग मदमस्त रहना,
वही हर हर महादेव हम में ही भगवान होते हैं
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गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
Waah...bht badhiya
ReplyDeleteबहुत बहुत आभार 🙏🙏
ReplyDeleteबहुत ही सुंदर रचना।
ReplyDelete👌👌👌
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