जिला--रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
शीर्षक-" गाँव की गोरी "
विधा--छ्न्द-मुक्त ।
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÷÷**""गाँव की गोरी ""**÷÷
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मेरा देश,देश का इक गाँव,
गाँव का नाम था, गोरी,
वहाँ रहती थी,
बाँकी इक छोरी ।
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नाम था,उसका भी गोरी ,
वो इठलाती फिरती,हिरनी-सी ,
गली-कुचे और घर --द्वारे ,
कभी पैरों से,गली की धूल उड़ाती,
तो कभी ,पनघट से पानी भरती ।
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जब आया ,उसमें,यौवन ,
तो बरसाती थी,
वो, सावन की, शीतल फुहार ।
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शादी का,जब मौसम आया,
गोरी,हो चली ,अब पराई,
घूँघट ली थी,
जैसे ,बदली में,छिपा हो चाँद ।
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माँ-बाप,सखियों ने और रिश्तेदारों ने,
बिदाई-जुदाई के आँसू,बहाये थे खूब,
कह दिया सभी लोगों ने,
कि,आज गाँव की गोरी ,
हो गई,आज से पराई ।
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माँ ने,रोते-रोते कहा-मेरी प्यारी बिटिया
नाम है, तेरा गोरी---
गोरी ही बनकर,सदा तुम रहना,
जिन्दगीं--भर ,तुम, सुख से जीना ।
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पर,पता चला,कुछ दिन बाद,
उसके,ससुराल से,यह खबर आई,
उसका पति,हरदम ,यही कहता ,
तू तो है, हमारी लुगाई,
पर,दहेज़ में,तूने,कछु न लाई,
तेरे, देह का,मैं क्या करूँगा ।
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मेरे व घरवालों के लिए ,
दहेज ही है,असली दूध-मलाई,
मैं,क्या करूँगा,खाली-हाथ की लुगाई।
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तेरे,माँ - बाप तो,दहेज़ तो,दे न पाये,
धीरे - धीरे ,गोरी सूरत,हुयी काली ,
इक दिन,दोनों परिवार के लिये,
वो,घड़ी भी, सामने आयी ।
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गोरी! सदा-सदा के लिए---
सुख से,चिरनिंद्रा में समा गई,
और ,सब कह रहे---
अब तो गोरी,हो गई,
सदा-सदा के लिए,हमारे से पराई ।
*********इति ***************
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व्याख्या:--इस रचना में रचनाकार ने यह बताने की कोशिश की है कि पत्नी कितनी भी सुशील,सुंदर व गुणवान हो,दहेज़ के लोभी लोगों को,दहेज़ रुपी धन-सम्पत्ति की लालसा हरदम लगी रहती है ।इक दिन ऐसा भी आता है कि मानसिक पीड़ा को सहन करते-करते,दुनियाँ से ही चल बसती है ।समाज में दहेज़ दानव व अभिशाप बन के रह गया है ।
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स्वरचित प्रस्तुति-अरमो,रायपुर ।
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