जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- क्या हुआ अगर?
चलें जो लक्ष्य साधकर,
गिर जाते हैं हम अक्सर,
क्या हुआ अगर?
चल पड़े फिर उठकर।
आते हैं राह में चौराहे,
चुने किसे ना हो खबर,
क्या हुआ अगर?
चुना अपने मर्जी का सफर।
जग जाहिर है यह बात,
कुत्ते भौंके हजार, हाथी चले जो बाजार,
क्या हुआ अगर?
चल पड़ा गजराज सा, लोगों से मुकरकर।
खरगोश - कछुए की दौड़ में,
वो खरगोश और मैं कछुए सा चला,
क्या हुआ अगर?
वो सुस्ताए, मैं चलता रहा निरंतर।
व्याख्या:- उपरोक्त रचना में रचनाकार ने समाज के उस पक्ष पर कटाक्ष किया है जो अक्सर बात बना लेते हैं कि यह गलत है। यह सही है। और इन सब के बीच रचनाकार अपने मन में सकारात्मक भाव बनाए रखते हैं।
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