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रचनाकार -- प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला -- राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़)
शीर्षक -- जगन्नाथ पुरी
विधा -- दोहा
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।।१।।
नाथ जगत प्रभु आप हैं , पुरी नाम निज धाम ।
नित्य करते हैं वंदना , सदा यही है काम ।।
।।२।।
देने दर्शन देव ने , मंदिर बाहर आय ।
देखत अनुपम रूप को,धन्य भगत हो जाय ।।
।।३।।
प्रचलित पुरानी है कथा , जगन्नाथ के नाम ।
असर जगत पर है करे , जनता जाने आम ।।
।।४।।
मात यशोदा देवकी , बहन सुभद्रा साथ ।
वृंदावन से द्वारिका , आये धर कर हाथ ।।
।।५।।
करे निवेदन रानियाँ , कथा कही है मात ।
बेसुध होकर है सुनी, बाल किसन की बात ।।
।।६।।
बहन सुभद्रा द्वार है , भाई दोनो ना आय ।
दाउ कृष्ण सब है सुने ,जान कोय ना पाय ।।
।।७।।
मात यशोदा से सुनी , लीला दोनो कोय ।
आँख बडे़ लट हो खडे़ ,भ्रात दंग दो होय ।।
।।८।।
बाल कथा सब भाय है , महिमा कृष्णा भाय ।
जान सकै ना कोय है ,मुनिनवर भी आ जाय।।
।।९।।
नारद मोहक रूप में , मोहित होता जाय ।
अनुभव करके सब उठे , आने कोई आय ।।
।।१०।।
ऐसे मोहक रुप है धरे , प्रभु तुम कब भू आय ।
मुनि सुनि कृष्णा है कहे ,कलियुग धर रुप काय।।
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व्याख्या। :---
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जगन्नाथ हिन्दू भगवान विष्णु ,
श्री कृष्ण का ही एक रुप है । ओडिसा राज्य के पुरी
शहर में भगवान जगन्नाथ जी का भव्य मंदिर स्थित है ।
वर्ष में एक बार इसकी एक रथ यात्रा निकलती है ।
और यह यात्रा केवल भारत में ही नही वरन
पुरे विश्व में प्रसिद्ध है ।
इस रथ यात्रा में जगन्नाथ ,भाई बलभद्र
अर्थात बलराम और बहन सुभद्रा की रथ निकली है ।
इसी से जुडी़ हुई प्राचीन कथा का कुछ अंश
यहाँ पर दोहा के रुप में आपके सम्मुख रखने का एक
छोटा सा प्रयास किया है ।
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रचनाकार
प्रवीण कुमार ठाकुर
बहुत अच्छा
ReplyDeleteBahut sunder sir
ReplyDeleteBahut sunder sir
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