स्थान- तमनार, रायगढ़
शीर्षक -"ललकार"
विधा- कविता,(वीर रस)
"ललकार"
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पुलवामा की धरती हुई लहूलुहान
40 सपूतों ने दे दी अपनी जॉन
खून से लथपथ समंदर
दिल दहलाने वाला मंजर
देश के मुंह पर तमाचा
सुरक्षा का फूटा भांडा है
देखो करतूत पाकिस्तान की
नाम तो पाक और
नापाक नजरें रखा है
हम बदला चाहते हैं
भाइयों के शहादत का
इंसाफ चाहते हैं
पाक के करतूतों का
रोक दो सारे ताल्लुकात
खेल हो या व्यापार
दोस्ती के लायक नहीं गद्दार
पनाह में रखे आतंकी
और देता रहता गिदड़ भभकी
अब समय आ गया
आर-पार की हो वार
शांति वार्ता है बेकार
लातों के भूत कहां बातों से मानते
भारत को कहां वो अभी जानते
हर एक लाल की गूंजेगी ललकार
भागने की जगह भी नहीं मिलेगी
कैसा देश है रे तू तुझे है धिक्कार
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