रचनाकार -- प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला -- राजनांदगाँव (छ.ग.)
शीर्षक -- अहंकार
विधा -- दोहा
रस -- वीभत्स रस
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।।1।।
बात अहम ये जान लो , करो नहीं
अभिमान ।
मूल यही है नाश का , रखो सदा
ये ध्यान ।।
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।।2।।
नश्वर काय है मानवा , बात राज
की जान ।
तेरा मेरा कुछ भी नहीं , करता
किसका मान ।।
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।।3।।
नित्य जले जो राख हो , रवि बन
कर उजियार ।
हंस फंसे है जाल में , राह चले
व्यभिचार ।।
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।।4।।
विटप कटे अति ताप है , बढे़ जीव
संताप ।
बढ़ती निशदिन आपदा , बढे़ धरा
पर पाप ।।
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।।5।।
दर्प बडा़ वरदान का , राजा था
लंकेश ।
अहं नाश नृप था हुआ , अंत कहे
रघु ईश ।।
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।।6।।
पाप बढा़ था कंस का , विष्णु लेत
अवतार ।
ग्रास बना है काल का , कृष्ण करे
उद्धार ।।
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रचनाकार
प्रवीण कुमार ठाकुर
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व्याख्या :---
प्रस्तुत दोहा में हमने प्रदत्त विषय
को लक्ष्य करते हुए आज के दिन
की सृजन विषय अहंकार लिखा
है। जिसमें यह बताने का प्रयास
किया गया है कि दर्प सर्वदा विना
-श का कारण बनता है ।
हमे किसी भी प्रकार से घमंड नहीं
करना चाहिए ।क्योंकि दुनियां में
हर चीज नाशवान है ,केवल हमारे
सद कर्म ही हमारे , हमें जिंदा रख
सकतें हैं । हमें सदा जन हीत में
परोपकार करते रहना चाहिए ।
यही इस सजन का अभिप्राय है ।
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अति उत्तम
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