जिला:- रायगढ़ ,छत्तीसगढ़
विषय:- अहंकार
शीर्षक:- घमंडी
विधा:- मुक्तक
घमंडी
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जेब मे जब आ जाते पैसा,आ जाता है गुमान।
अहम की ये गरिमा कैसी,पद मिलते ही बन जाते शैतान।।
दीन दुखी रज पैर का,कटार बन जाते जुबान।
चापलूसों से पूजा कराके बन जाते भगवान।।
सर कट जाते जो न झुकते,चलते ये सीना तान।
जमीं पर पग न थमते, सपने छुये आसमान।।
झूठ को भी सच कर जाते ,खरीदकर कर कौड़ी दाम।
बाकी सब रसातल,ऊपर इनका नाम।।
राग द्वेष ईर्ष्या गहना है,जीते दांव तमाम।
जो चाहे करवा दे,ऐसी ऊंची शान।।
अपने घमंड में चूर रहते,बाकी कीड़ा समान।
राह चलते जो मुह लगे,होता जीना हराम।
गर्व करते खुद पर,चाहे कोई न मान।
मेरी मुर्गी एक ही टांग,बस यही सब जान।।
वक्त पर किसी का जोर नहीं,मत भूलो ईमान।
ऊपर की जब लाठी पड़ती ,मिलता है श्मशान।।
जब देह अकड़े बिस्तर पर पड़े,बनेगा शरीर जब कमान।
ना दौलत काम आएगी,ना काम आएगी कोई पहचान।।
जिंदगी पर तेरा बस नहीं,क्षणिक है ऊंची शान।
आसमान से तारे भी टूटते है, तू घमंड मत कर ये इंसान।।
मौलिक रचना
अजय पटनायक✍
Very nice ajay Bhai
ReplyDeleteWao kya bat hai superb
ReplyDeleteVry nice sir...
ReplyDeleteBahut sundar
ReplyDeleteबहुत सुंदर भैया
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