Saturday, June 27, 2020

रायगढ़ से अजय पटनायक की रचना- किलकारी

रचनाकार- अजय पटनायक
जिला- रायगढ़,छत्तीसगढ़
विधा- कविता(छंद मुक्त)
शीर्षक- किलकारी
सन्दर्भ:- बाल अपराध ,बाल सुरक्षा

      *किलकारी*
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रोक सको तो रोक लो तुम,जलती हुई फुलवारी को।
पिंजरे पर क्यों कैद रखे हो,बचपन की किलकारी को............


घर आंगन में सजते बुलबुल,गांव गली में खिलते हैं। 
चहचहाते अंजुमन में,बड़े नसीबो से मिलते हैं।
टूट रहे पायल कि घुंघरू,रोक लो इस लाचारी को।
पिंजरे पर क्यों कैद रखे हो,बचपन की किलकारी को.........…


सुनकर उसके बोली भाषा,सुर संगीत भुलाते हैं।
देख सुंदर सा मुखड़ा प्यारा,चांद भी शर्माते हैं।
नटखट भी बिकने लगे है,रोक लो इस व्यापारी को।।
पिंजरे पर क्यो कैद रखे हो,बचपन की किलकारी को...........


खुशियां लुटाते संबंधों में,खुशबू जैसे चंदन है।
बाल रूप है सबसे न्यारा,करते सब अभिनंदन है।
बाल उत्पीड़न बढ़ रहे है ,रोक लो इस चिंगारी को। 
पिंजरे पर क्यों कैद रखे हो, बचपन की किलकारी को............


नशाखोरी और व्यभिचारी,शोषण पर भी ध्यान करो।
बच्चे कल के भविष्य हैं,उन ऊपर सदा अभिमान करो ।
स्वस्थ रहे आगे बढ़े ,रोक लो हर बीमारी को।
पिंजड़े पर क्यों कैद रखे हो,
 बचपन की किलकारी को..................


भीख सड़क पर मांग रहे है,कोई बर्तन है धो रहा।
सुंदर से इस बीज को,कंकड़ पत्थर पर बो रहा।
निकालो अपराधों के दलदल से,भूलो न  जिम्मेदारी को। 
पिंजरे पर क्यों कैद रखे हो,बचपन की किलकारी को....…..........


 शिक्षा का अधिकार दिला दो,सपनों का संसार मिले।
बचपन न अभिशाप बने,उनके हिस्से का प्यार मिले। 
बाल सुरक्षा है जरूरी,
पूरी कर लो तैयारी को।
पिंजरे पर क्यो कैद रखे हो,बचपन की किलकारी को.............

            मौलिक रचना
          अजय पटनायक

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