जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- एक तलाश
एक तलाश जीवन की,
जो बदस्तूर जारी रहेगी,
चुपके-चुपके उर से,
वह सौ बार कहेगी।
जाने कब, कहां और कैसे?
पूरी होगी हृदय की तलाश,
फिर - फिर कब तक उठती रहेगी,
मन में यह अद्भुत अहसास।
जाने जिन्दगी कब तलक,
रहेगी यूं ही उदास,
अगर - मगर, इधर - उधर, चाहे जिधर,
मिलेगी जाने कहां, कब, कैसे?
मुझे सुकून कुछ खास।
जब करता हूं तलाश,
लगता है यूं की मैं ढूंढता हूं,
जेठ में सावन की वर्षा भारी,
सफेद धवल कास की फुलवारी,
जैसे सावन के महीने में खोजुं,
तपते धूप का अहसास,
अरुणमय फूल पलाश।
मगर समय बदला, बदलते दस्तूर,
ना बदला अब तलक मेरा यह फितूर,
कभी मन मस्तिष्क पर कभी मस्तिष्क मन पर भारी,
आदी से अंत तक फिर भी तलाश रहेगी जारी।
व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने मनुष्य के उस स्वभाव को व्यक्त किया है कि मनुष्य कि तलाश जन्म से मरण तक जारी रहता है।
इन पंक्तियों के अलंकरण के लिए रचनाकार ने अनेक अलंकारों का एक साथ प्रयोग किया है यथा अनुप्रास अलंकार, पुनरुक्तीप्रकाश अलंकार इत्यादि।
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