विधा- छंद मुक्त
शीर्षक- "शहीद"
है नमन उन शहीदों को,
जो तजकर प्राण अपना खुद ही गुमानी हो गए हैं।
कुल के थे कुल तारक, अब तार-तार कर कुल को अभिमानी हो गए हैं ।।
की है नमन उन वीरों को,
जो मर मिट गए सरहद पर, और नाम अपना सरहदी कर गए हैं ।
जय जय कार के जयघोष से गूंज रहा है वो काम ऐसा एक सदी कर गए हैं ।।
नवविवाहित नववधू निज पत्नी का भाल तो चूम लिया है ।
मां का आशीष लिए पिता के आंखों से बारिश में झूम तो लिया है ।।
फिर लौटना ना हुआ तो कोई गम नहीं,
नवजात को बाहों में लिए घर आंगन में घूम तो लिया है ।।
द्वार पर घर की लाडली क्यों बार-बार झांक रही है ।
कर्ज राखी के मोल का कहां कोई सूचकांक रही है ।।
मैं सैनिक मेरी मौत पर आंसू न बहाना खूब जश्न मनाना,
मौत के दरबार में अब मेरी ही अनुक्रमांक रही है ।।
साथ साथ बचपन में खेला,भाई तेरी याद बहुत आएगी
रह रह कर वो शैतानियां वो नादानियां बहुत रुलाएगी ।
पर इक दिन मौत तो आनी है आएगी ही,
तिरंगे में लिपटा आऊं तो कहना मॉं से वही लोरी फिर सुनाएगी ।।
जरा जी भर के देख लूं इन यादों में सिमटी गलियों को
कोई तोड़े तो जरा आहिस्ता तोड़े इन अधखिले कलियों को ।
मैं भी खूब नाचूंगा उस सरहद पर,
बस पिता ही नचाए कंधे पर हम कठपुतलियों को ।।
मौलिक रचना :
गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
Superb👍👍
ReplyDeleteबहुत-बहुत शुक्रिया अवधेश भाई 🙏🙏
ReplyDeleteSuperb khamhari sahab
ReplyDeleteजी धन्यवाद🙏🙏🙏
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