विधा _ छंद मुक्त कविता
रचनाकार _सावित्री यादव "सावि "
बिलासपुर छ. ग.
शीर्षक _ विचलित मन
विचलित मन
विचलित मन कहाँ चैन पाता है
जिस बात को नहीं सोचना होता है|
उसी मे मन लगाता है |
मन की बेचैनियाँ किससे कहूँ ये मन ही है |
जो सब कुछ करवाता है |
मन मे ऐसी टिस उठती है |
और दर्द बढ़ जाता है |
विचलित मन कहँ चैन पाता है |
कितने ख्वाब टूटे कितने रिश्ते छूटे |
बस उम्मीद नहीं टूटती ना सांस छूटती |
परिंदे सा ये मन उड़ता है उड़ान अपनी |
ना मंजिल मिलती ना आसमान मिलता है |
विचलित मन कहँ चैन पाता है |
कभी भरोसा कर रोये |
कभी साथ के लिये रोये |
कभी किस्मत ने साथ नहीं दिया |
कभी अपनों ने साथ छोड़ दिया |
बस ऊपर वाले से रिश्ता ऐसा हुआ |
हर बार ईश्वर हर गम मे गले लगाता है |
विचलित मन कहँ चैन पाता है |
ना उसने साथ छोड़ा ना मैंने विश्वास तोड़ा |
रिश्ते की डोर ऐसी बंधी की,
बिना बांधे बंध गई ऐसा होता है |
ज़ब मन मिले तो रिश्ता जुड़ जाता है |
विचिलत मन कहाँ चैन पाता है |
बस अब इच्छा है कुछ अच्छा कर जाए |
ज़ब इस दुनिया से जाए |याद करने जैसा,
कुछ कर जाए | मन मे यही अरमान रहता है |
ईश्वर मुझ पर कृपा अपनी बनाये रखते है |
उसी से उम्मीद का दीया जलता है |
विचलित मन कहाँ चैन पाता है |
भावर्थ _ बेचैन मन की दशा का वर्णन |
रचनाकार सावित्री यादव "सावि "
बिलासपुर छ. ग.
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