Saturday, June 27, 2020

बिलासपुर से सावित्री यादव "सावि" की रचना- विचलित मन

विधा _ छंद मुक्त कविता 
रचनाकार _सावित्री यादव "सावि "
              बिलासपुर  छ.  ग.
              शीर्षक _ विचलित मन 


     विचलित मन 


विचलित मन कहाँ  चैन  पाता  है 
जिस बात को नहीं सोचना होता है|
उसी मे मन लगाता  है |

मन की बेचैनियाँ  किससे  कहूँ ये मन ही है |
जो सब कुछ करवाता  है |
मन मे ऐसी टिस  उठती है |
और दर्द बढ़ जाता है |
विचलित मन कहँ  चैन पाता है |

कितने ख्वाब  टूटे  कितने रिश्ते छूटे |
बस उम्मीद नहीं टूटती  ना सांस छूटती |
परिंदे सा ये मन उड़ता है  उड़ान अपनी |
ना  मंजिल मिलती ना आसमान मिलता  है |
विचलित मन कहँ  चैन पाता  है |

कभी भरोसा कर रोये |
कभी साथ के लिये  रोये |
कभी किस्मत ने साथ नहीं दिया |
कभी अपनों ने साथ छोड़ दिया |
बस ऊपर वाले से रिश्ता ऐसा हुआ |
हर बार ईश्वर हर गम  मे गले लगाता  है |
विचलित मन कहँ  चैन पाता  है |

ना उसने साथ छोड़ा  ना मैंने विश्वास  तोड़ा |
रिश्ते की डोर ऐसी बंधी की, 
बिना बांधे बंध गई ऐसा होता है |
ज़ब मन मिले तो रिश्ता जुड़ जाता है |
विचिलत मन कहाँ चैन पाता है |

बस अब इच्छा  है कुछ अच्छा  कर जाए |
ज़ब इस दुनिया से जाए |याद करने जैसा, 
कुछ कर जाए | मन मे यही अरमान  रहता है |
ईश्वर  मुझ  पर कृपा अपनी बनाये रखते है |
उसी से उम्मीद का दीया  जलता है |
विचलित मन कहाँ  चैन पाता  है |

भावर्थ  _ बेचैन मन की दशा  का वर्णन |

रचनाकार  सावित्री यादव "सावि "
           बिलासपुर  छ.  ग. 
        

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