जिला - गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश
शीर्षक - धरती मां की पुकार
विद्या:- कविता
धरती मां की है यही पुकार,
मेरे बच्चों करो मेरे सपनो को साकार,
पर्यावरण की सुरक्षा के लिए करो कुछ अच्छा कार्य।
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गांव - गांव और शहर - शहर सब लोगों से कहना है एक बात,
बंद कर दो प्लास्टिक का सेवन आज के बाद।
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मत कुरेदान बनाओ नदियों और तालाबों को,
बहने दो कलकल करते नदियों के पानी को।
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उड़ने दो पक्षियों को उन्मुक्त गगन में,
घूमने दो जानवरों को आज़ाद उनके जंगल में।
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हर दिन लगाओ एक पेड़ अपने आने वाले कल के लिए,
वरना तपती गर्मी में तरस जाओगे छांव के लिए।
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गाड़ियों और कारखानों के धुओं ने कर दिया है मुझे बीमार,
यह सब देख बहता है मेरे आंखों से अश्रुओं कि धार।
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धरती मां की है यही पुकार अब और न करो मुझे जख्मी,
बस मुझे दे दो सुरक्षा और प्यार।।
व्याख्या - प्रस्तुत कविता के माध्यम से कवियत्री यह बताने का प्रयास कर रही है कि बढ़ती हुई प्रदूषण समस्त जीवों और पृथ्वी को विनाश कि ओर ले जा रही है। चुकी पृथ्वी को हमने मां का दर्जा दिया है, इसीलिए धरती मां अपनी रक्षा के लिए अपने बच्चो से गुहार लगा रही हैं।
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